Skip to main content

Speed Thrillsss But Also Killsss....

Around 1 month ago,I met with a furious accident, a cycle, a scooter and my cab were running on a lonely path to my college, all of sudden cab started rotating and all of us were almost fainted. All of them were blaming each other for the accident. In my opinion only thing that was wrong is SPEED. All the three vehicles were in extreme(at least for me now)speed. Now its my daily routine, during travelling from home to college and college to home, I keep on saying to my driver, "drive slow,drive slow" and he become used to it, he just listen and keep on moving in same speed.That accident has given birth to a fear of speed, in-spite of enjoying the wind I sit like a baby who has lost her mother.

Almost every youngster wishes to have wings for their bikes, even they dont have still they treat roads as free sky and their bikes as "Udankhatola". I still dont understand do they love all these stuffs more than their lives. When anyone meets the accident its not only that person who suffers but their family too and it also bows the seed of constant fear of meeting such accident again.

So, enjoy riding, but make it safe. Do wear helmets and drive according to the space. And trust me if once you get a chance to meet Mr.Accident(may be no one ever meet him) you will not be able to forget him, and will keep on saying "Kaash speed me na hota/hoti(ladkiyan bhi kam nahi hai aaj kal ki)...





Comments

Popular posts from this blog

बचपन की पोटरी: किसी की मुस्कुराहटों...!

बात उन दिनों की है जब मैं तीसरी क्लास में थी और भाई दूसरी | हमे स्कूल बस पकड़ने के लिए करीब 200 मीटर चलकर गली से बाहर आना पड़ता था | ज्यादातर मैं और भाई अकेले ही चले जाते थे, पर कोशिश रोज़ होती के पापा हमे छोड़ने आये | कारण था नया नया स्टेट बैंक का एटीएम | याद है पहले हमे उसके अंदर जाने के लिए भी कार्ड स्वाइप करना होता था | जब तक बस नहीं आती हम उसी एटीएम के कमरे में घुस जाते और ऐसे रहते जैसे उन 5-10 मिनट के लिए हम उसके मालिक हों | कभी उसके केमेरे में देखकर अजीब अजीब शकल बनाते और कभी पूरे भारत में एस बी आई एटीएम की लोकेशंस प्रिंट आउट निकाल कर बैग में भर लेते | जब पापा उसमे कार्ड डालते तो राजाओं की तरह उसे पैसे निकालने का आदेश देते | कभी जब खेलने का मन नहीं होता तो हम बस कांच से बहार की दुनिया देखते रहते | जैसे हमारे लिए सब नया हो, जैसे हमे इस दुनिया के हैं ही नहीं | सुबह के सात बजे हमे हमारे छोटे से 5 मिनट के महल में कोई परेशान करने नहीं आता | हाँ महल | वरना ए सी की ठंडी हवा और कहाँ खाने मिलेगी, वो भी मुफ्त !

एक दिन सुबह बहुत ज़ोरों की बारिश हो रही थी | पापा को पिछली शाम बारिश में भीगकर घर…

मेरे पानी वाले बाबा... !

"बाबा आज खुल्ले पैसे नहीं हैं | "
"कोई बात नहीं बिटिया, आज का रहने दो | "
"अरे नहीं बाबा मैं कल दे दूंगी | "

 इतना बोलते ही मेरी बस आ गई और मैं भीड़ के साथ आगे बड़ गई | मैं बाबा का नाम नहीं जानती | ना ये के वो कहाँ से हैं | बस इतना जानती हूँ के वो रजनीगंधा चौक बस स्टॉप पर, २ रुपया में एक गिलास पानी पिलाते हैं | मैंने उनसे कभी पूछा नहीं | हम सब बस स्टॉप पर या तो जल्दी में भाग रहे होते या पसीना पौंछते हुए गर्मी को कोसते रहते, पर बाबा गाना गाकर सबको पानी पिलाते (पानी रे पानी तेरा रंग कैसा... ) | १५ महीने पहले जब बाबा को पहली बार देखा तो लगा के वो पागल हैं | हर शक्श से जा जा कर पूछ रहे थे के उन्हें पानी तो नहीं चाहिए | कोई हाँ करता तो कोई अनसुना कर देता | पर मैं गलत थी | वो हर समय गाना गाते रहते और मुस्कुराकर लोगों से बात करते रहते थे | कभी कोई गुस्से में धुत्कार देता तो अपना गाना गाते हुए आगे बड़ जाते | दिन का १०० २०० रुपया कमाते होंगे, पर पूरी ख़ुशी के साथ | मेरे पास बोतल होती थी हमेशा, फिर भी कभी कभी बाबा से पानी ले लेती थी | शायद कुछ अलग था उस पानी था, शायद …

Chocolate and Me...

This post has been published by me as a part of the Blog-a-Ton 53; the fifty-third edition of the online marathon of Bloggers; where we decide and we write. In association with ​Soulmates: Love without ownership by Vinit K Bansal. To be part of the next edition, visit and start following Blog-a-Ton.
One fine morning, when the sun was bright; I was craving for chocolate, straight from night. I ran to my mother, jumped and gave her kiss, She gave me my chocolate as she promised. I was holding it tight, like the rat in eagle’s claw, Enjoying it thoroughly which my brother had saw. He came with a report card, pretending to whine, Said he’ll give me a bigger one, if I got it signed. I made my way toward the terrace for solace, After giving him my best ‘Do you think I’m stupid face’? I wave a pretentious hello to my despicable neighbor, Smiling at him, is itself a big favor. Besides failing a hundred times, he offered this time straight, ‘I’ll shower you with chocolate if you’ll agree for …